उत्तराखंड की तीरथ सरकार ने सोमवार को आयुर्वेदिक डॉक्टरों को आपात स्तिथि में एलौपैथिक दवाएं लिखने की इजाजत दे दी है। इस मुद्दे पर इंडियन मेडिकल काउंसिल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए राज्य सरकार के फैसले को “गैर कानूनी” करार दिया है। आईएमए उत्तराखंड के प्रेसिडेंट डॉक्टर अरविंद शर्मा ने कहा- आयुर्वेदिक डॉक्टर भी एलौपैथिक दवाएं लिखेंगे तो एलौपैथिक पर सवाल क्यों उठाए जा रहे थे।

उत्तराखंड के आयुष मंत्री हरक सिंह रावत ने फैसले की तारीफ करते हुए कहा- सीएम तीरथ सिंह रावत ने लंबे समय से चली आ रही आयुर्वेदिक डॉक्टरों की मांग को मंजूरी दे दी है। उन्होंने कहा- इस फैसले से दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों को मदद मिलेगी क्योंकि इन इलाकों में एलोपैथिक डॉक्टरों की बेहद कमी है।

एलौपैथिक और आयुर्वेद के बीच श्रेष्ठता की जंग उस समय शुरू हुई जब योग गुरु रामदेव ने एक कथित वीडियो में पश्चिमी चिकित्सा पद्धति पर सवाल उठाया। रामदेव ने एलौपैथिक को ‘स्टुपिड साइंस’ करार दिया था। वीडियो में रामदेव ने कथित रूप से कहा था कि रेमडेसिविर जैसी दवाएं कोरोना मरीजों का इलाज करने में असफल रही हैं। इन आरोप प्रत्यारोपों के बीच उत्तराखंड आईएमए ने रामदेव पर 1000 करोड़ रुपये का मानहानि का दावा किया था।

समय की मांग है कि ऐसे नकारात्मक विवादों से बचा जाए, हमें आयुर्वेद बनाम एलोपैथिक नहीं होने देना चाहिए, दोनों चिकित्सा पद्धतियों का अपना महत्व है। दोनो की अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकार्यता भी है। दोनों में से किसी एक की नहीं, दोनो को आवश्यकता है। एक तरफ आयुर्वेद हमारी सनातन चिकित्सा पद्धतियों में से एक है, दूसरी तरफ भारत एलोपैथिक दवाओं के उत्पादन में विश्व में शीर्ष पर है।

कोरोना जैसी महामारी में डॉक्टरों, कोरोना वारियर्स, और हेल्थ वर्कर्स के हौसला अफजाई का वक्त है, जिससे वो अपना तन और मन से देश की सेवा कर सके। भारत को अभी जल्द से जल्द लोगो को वैक्सीनेशन करने की प्राथमिकता है, न कि ऐसी बेमतलब की बहस में पड़ कर, अपना समय गवाना है और तीसरी लहर से पहले ज्यादा से ज्यादा लोगो को वैक्सिनेट कराना भी एक बड़ी चुनौती है।

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